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तीर्थों पर वंशावली की पांच सौ साल पुरानी पाेथियां:पुरोहितों को सिर्फ नाम और गांव बताओ
कंप्यूटर से आज एक क्लिक पर जानकारी सामने आ जाना आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि इसमें मशीन काम कर रही है लेकिन यहां पितृ तीर्थों पर यजमानी करने वाले पंडितों ने ऐसी मैन्युअल तकनीकी सैकड़ों साल पहले तैयार कर ली थी।
आप अपना नाम, गोत्र और गांव का नाम बताओ, वे तुरंत अपनी पोथी खोल कर आपके पूर्वजों की जानकारी दे देंगे। लेकिन अब इन पाेथियों को सुरक्षित रखने के लिए इनका डिजिटिलाइजेशन कराया जा रहा है। सैकड़ों साल पुराने पाेथियों के पन्नों की फोटोग्राफी कर उन्हें कम्प्यूटर में सेव कर रहे हैं। इनके अलावा कंप्यूटर में भी यह रिकॉर्ड तैयार करा रहे हैं।
धर्माधिकारी पं. गौरव उपाध्याय के अनुसार सिद्धवट घाट, रामघाट और गया कोठा तीर्थ पर पितृ कर्म कराए जाते हैं। करीब 350 ब्राह्मण परिवार हैं जो तीर्थों पर पूजन-पाठ और पितृ कर्म कराते हैं। इनमें 70 परिवार ऐसे हैं जिनके यहां सैकड़ों साल पुरानी पाेथियों में देशभर के अपन यजमानों की वंशावली सुरक्षित है। इनमें अधिकांश समाजों के पुरोहित हैं। यानी वे जिस समाज के पुरोहित हैं, उस समाज के लोग उनके पास ही आकर कर्म कराते हैं। कई ऐसे हैं जो घाट पर आए लोगों के कर्म कराते हैं, इनके पास पाेथियां नहीं होती।
सिद्धवट घाट के पुरोहित 1537 से सहेज रहे वंशावलियां
सिद्धवट के तीर्थ पुरोहित पं. राजेश त्रिवेदी परिवार के पास सन् 1537 से यजमानों का रिकॉर्ड पाेथियों में है। वे बताते हैं पुरानी पाेथियों का कागज खराब होने पर उनका रिकॉर्ड नई पौथी बनाकर सुरक्षित किया जाता है। इसके लिए पाेथी लिखने वाले खास लोगों की सेवा लेते हैं। वे पुरानी लिखावट और पाेथी परंपरा के जानकार होते हैं। वे पुराने रिकाॅर्ड को पढ़कर नई पाेथी में लिखते जाते हैं। इस तरह रिकाॅर्ड सुरक्षित रहता है।
पूर्वजों के सैकड़ों साल पुराने अंगूठे के निशान व हस्ताक्षर
पुरोहितों की पाेथियों में यजमानों के सौ-दो सौ साल पुराने पूर्वजों के अंगूठा निशान या हस्ताक्षर हैं। उनके वंशज जब अपने पूर्वजों की लिखावट देखते हैं तो अचंभित हो जाते हैं। उनकी फोटो खींच कर ले जाते हैं। पं. त्रिवेदी बताते हैं कि 100-200 साल पुराना कागज अब तक चल रहा है लेकिन 10-20 साल पुराना खराब हो रहा है। ऐसे में पाेथियों को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसलिए डिजिटिलाइजेशन को अपना रहे हैं।